128 गांवों के आदिवासियों का अल्टीमेटम, 60 दिन में मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन
सीतानदी-उदंती टाइगर रिजर्व क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन पर अधिकारों की मांग को लेकर ग्राम कोकड़ी में महाग्राम सभा आयोजित हुई। इसमें धमतरी और राजापड़ाव क्षेत्र के 128 गांवों एवं पारा-टोलों से करीब 5 हजार ग्रामीण शामिल हुए। ग्रामीणों ने विस्थापन पर रोक, चेकपोस्ट संबंधी आदेश वापस लेने, बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने और वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा देने की मांग की। मांगों पर कार्रवाई के लिए शासन-प्रशासन को 60 दिन का समय दिया गया है।
UNITED NEWS OF ASIA. राधे पटेल, गरियाबंद l छत्तीसगढ़ के सीतानदी-उदंती टाइगर रिजर्व क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन पर अधिकारों की रक्षा को लेकर आदिवासी समाज ने आंदोलन की चेतावनी दी है। 17 अक्टूबर को मैनपुर तहसील के ग्राम कोकड़ी में आयोजित महाग्राम सभा में धमतरी और राजापड़ाव क्षेत्र के 128 गांवों एवं पारा-टोलों से करीब 5 हजार ग्रामीण शामिल हुए। सभा में महिलाओं, पुरुषों और युवाओं की बड़ी भागीदारी रही। ग्रामीणों ने वन विभाग की बैरिकेडिंग, आवागमन पर प्रतिबंध और विस्थापन की आशंकाओं को लेकर अपनी चिंताएं रखीं। सभा में शासन-प्रशासन के समक्ष मांगें रखते हुए उन्हें पूरा करने के लिए 60 दिन का अल्टीमेटम दिया गया।
चार प्रमुख मांगों पर ग्रामीणों ने जताई एकजुटता
जल, जंगल, जमीन बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले आयोजित महाग्राम सभा में ग्रामीणों ने चार प्रमुख मांगें रखीं। पहली मांग है कि ग्रामसभा की अनुमति के बिना किसी भी गांव को विस्थापित नहीं किया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि गांवों से जुड़े निर्णयों में ग्रामसभा की सहमति और स्थानीय समुदाय के अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
दूसरी मांग शाम 7 बजे के बाद रास्तों पर चेकपोस्ट बंद करने संबंधी आदेश को वापस लेने की है। ग्रामीणों ने कहा कि रात के समय आवागमन पर प्रतिबंध से बीमार व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और अन्य जरूरतमंद लोगों को आपातकालीन परिस्थितियों में परेशानी हो सकती है। इसलिए आवागमन को लेकर ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे लोगों को आवश्यक सेवाओं तक पहुंचने में बाधा न आए।
तीसरी मांग धमतरी और राजापड़ाव क्षेत्र के 128 गांवों एवं पारा-टोलों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करने की है। ग्रामीणों ने सड़क, बिजली, पुल-पुलिया और मोबाइल नेटवर्क जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया। उनका कहना है कि दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी विकास और आवश्यक सेवाओं का लाभ मिलना चाहिए।
चौथी प्रमुख मांग वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा देने और पात्र आदिवासी परिवारों को जमीन का मालिकाना हक उपलब्ध कराने की है। ग्रामीणों ने इसे अपने अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया।
60 दिन में कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन की चेतावनी
महाग्राम सभा में ग्रामीणों ने ‘लड़ेंगे-जीतेंगे’ के नारे लगाते हुए अपनी मांगों के समर्थन में एकजुटता प्रदर्शित की। सभा में निर्णय लिया गया कि शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को मांगों पर ठोस कार्रवाई करने के लिए 60 दिन का समय दिया जाएगा। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि निर्धारित अवधि में समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आंदोलन तेज किया जाएगा।
अब संबंधित प्रशासन के सामने वन संरक्षण, आदिवासी अधिकारों, आवागमन और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर संवाद स्थापित कर समाधान निकालने की चुनौती है। महाग्राम सभा के माध्यम से ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि वे अपनी मांगों को लेकर संगठित हैं और समाधान के लिए शासन-प्रशासन से कार्रवाई की अपेक्षा कर रहे हैं।