
UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रामक और आपत्तिजनक विज्ञापनों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो महीने के भीतर शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि ऐसे विज्ञापन समाज को गुमराह कर नुकसान पहुंचाते हैं, इसलिए इन पर कड़ी निगरानी और सख्त कार्रवाई आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्देश
न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और उज्जल भुइयां की पीठ ने राज्यों से कहा कि वे 1954 के ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन निषेध) अधिनियम के तहत निषिद्ध विज्ञापनों के खिलाफ आम जनता की शिकायतों के लिए एक उपयुक्त व्यवस्था बनाएं। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस तंत्र को भी इस कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए संवेदनशील बनाने का निर्देश दिया।
IMA की याचिका बनी मुद्दे की जड़
यह मामला भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) द्वारा वर्ष 2022 में दायर की गई एक याचिका से जुड़ा है। IMA ने आरोप लगाया था कि टीकाकरण अभियान और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के खिलाफ भ्रामक जानकारी फैलाने वाले विज्ञापन प्रसारित किए जा रहे हैं, जो जनता के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हो सकते हैं।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश 2 महीने के भीतर शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करें।
इसकी जानकारी और उपलब्धता के बारे में नियमित प्रचार-प्रसार किया जाए।
पुलिस को 1954 के अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
7 मई 2024 को अदालत ने केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 के तहत विज्ञापनों के प्रसारण से पहले विज्ञापनदाताओं से स्व-घोषणा प्राप्त करने का आदेश दिया था।
क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से झूठे दावों, भ्रामक विज्ञापनों और समाज को गुमराह करने वाली मार्केटिंग रणनीतियों पर लगाम लगेगी। इसके साथ ही, आम जनता को शिकायत दर्ज कराने का एक अधिकारिक मंच मिलेगा, जिससे इस तरह के मामलों पर तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित की जा सकेगी।













