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पढ़ें संजय मिश्रा की पूरी फिल्म समीक्षा वध हिंदी में

‘वध’ फिल्म समीक्षा: कभी-कभी एक नपी तुली स्क्रिप्ट जन्म लेती है। राइट टाइम तो शायद बहुत गुप्त रूप से नहीं सोचा जा सकता है और अगर आप ही फिल्म डायरेक्टली भी बने रहें तो ये मुमकिन है कि कहानी का झटका एक तरफ हो जाए या शूट करें, आप भावनाओं में बह कर स्क्रिप्ट से परे जा सकते हैं कुछ भी शूट कर लें। दिसंबर 2022 में कुछ को फिर थिएटर में और अब फरवरी 2023 में एक्टिवेट पर रिलीज फिल्म “वध” निश्चित रूप से उन फिल्मों में रखी गई सोच है जहां एक भी दृश्य नहीं है बल्कि लगता है कि मिस्ट और सीन होते हैं तो कितना मजा आता है। वध एक लाजवाब फिल्म है। सीधा, सीधा, सरल, मर्मस्पर्शी और दो टूक बात करने वाला। इस तरह की फिल्में जरूर देखी जानी चाहिए क्योंकि इस दुर्घटना के सिनेमा, हिंदी फिल्मों में कम ही देखने को मिलते हैं।

अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ देखते समय ये भावना मन में आई थी कि इस फिल्म को एक वेब सीरीज बनाया जाए, या फिर इस सीरीज के और हिस्से बनाए जाएं ताकि ये फिल्म आगे बढ़ती रहे, कहानी आगे बढ़ती रहे, लेकिन फिल्म देखें निरन्तर। ‘वध’ इतनी नपीतुली लिखी और बनाई गई है कि फिल्म खत्म हो जाती है मगर मन नहीं दिखता। ऐसा लगता है कि इसे आगे और कुछ करना चाहिए। दुनिया से बदला लेना चाहिए लेकिन लेखक द्वय जसपाल सिंह संधू और राजीव बरनवाल, दोनों ने अपना पहला फीचर फिल्म को मेरे सर्वे से कम से कम शिकायतें बार लिखा होगा, बदलाव किया होगा, फिर लिखा होगा और “फिल्मीकरण” के सारे सबूत जब तक मिटाए नहीं दिए गए, इस कहानी में बारंबर सुधार करते और लिखते हैं। क्या जादू लिखा है, क्या जादू किया है और क्या जादू किया है। सिनेमैटोग्राफ़ी और एडिटिंग को अलग से सलाम है क्योंकि इस फ़िल्म का एक भी दृश्य आँखों को चुभता नहीं है और एक भी दृश्य, लीक से हटा या जबरदस्ती घुसाया नहीं गया है।

संजय मिश्रा और नीना गुप्ता पति पत्नी हैं। टैगा में रहो। गरीब हैं। बेटे को विदेश में रहने के लिए बैंक से बमुश्किल 10 लाख का लोन और एक कर्ज देने वाले स्थानीय गुंडे से 15 लाख का कर्ज लिया। वहीं जा कर बस गया, बेटा शादी कर ली और अपनी पुरानी जिंदगी से लगातार खुशी में बिजी है। माता-पिता के कॉल से वो परेशान रहता है। मिश्रा जी के घर में स्थानीय गुंडा लूट करने का गुट रहता है और उनके घर को एक होटल की तरह इस्तेमाल करता है। कर्ज में दबा हुस आदमी, गुंडे से हमेशा दबता ही रहता है। ये शिशिल रहता है जब तक कि ये गुंडा, मिश्रा जी की 12-13 साल की स्टूडेंट और बेटी सामान प्यारी लड़की पर बुरी नजर नहीं डालती। संजय मिश्रा अपना खून देते हैं, बॉडी के टुकड़े कर के बोर में भर कर फेंक देते हैं और अगले दिन पेट्रोल ले जा कर उसे दे देते हैं। अच्छे आदमी मिश्राजी, उसका संग्रह भी करते हैं क्योंकि गुंडा भी पांडे होता है। पुलिस को हो सकता है लेकिन मिश्रा जी अपनी बुद्धि का परिचय देते हैं न सिर्फ इस क़त्ल के इलजाम से बचते हैं। बल्कि अपना घर उस छोटी लड़की के पिता को दे कर कहीं चल देते हैं।

संजय मिश्रा अंगार हैं। हमेशा उन्हें अटकाते और अटकते रहने की आदत सी हो जाती है लेकिन वे भी 3-4 कॉमेडी फिल्में करने के बाद अचानक ही एक जादू की सीरियस फिल्म दे देते हैं। ऐसा लगता है कि वे शर्मिंदा के लिए अपने पापों को कर रहे हैं। एक बेहद डरावने व्यक्ति की आंख में दबे कुचले जाने से गुस्सा भी ठीक नहीं लगता। संजय जब फाइनल में चतुराई से अपनी कर्ज से मुक्ति पा लेते हैं और लोन देने वाले गुंडे के बॉस को जेल में फंसा देते हैं तो भी उनके चेहरे पर कानियांपन आ नहीं पाता। ये बात इस बात का भी द्योतक है कि संजय मिश्रा को हम सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं लेकिन क्या करें, वो धोखे चिल भी कई अलग-अलग कन्विक्शन से बोलते हैं हर कन्विक्शन से वो वध में काटने से गुंडे का खून करते हैं। संजय मिश्रा की कार्य क्षमता और देखनी हो तो बंटी और बंटी और कंपनी में उनका काम देखें। उनके साथ हैं नीना गुप्ता। पिछले 2-3 सालों में नीना ने साबित कर दिया है कि कोई कसर नहीं छोड़ती है कि हिंदी फिल्म के अधिकांश दर्शकों के टाइप के आगे डाक टिकट शुरू करें, तो उनकी जैसी अभिनेत्री मौजूद है। जिस घर में कभी मीट मच्छी का जिक्र नहीं होता, उस घर में रहने वाले कमरे में गुंडा, शराब की समुद्र तट, एक वेश्या और रोस्टेड चिकन लेकर आता है। नीना का चेहरा पाठ होता है। नीना गुप्ता अद्भुत अभिनेत्री हैं जबकि उनका रोल छोटा है तब भी वो स्क्रीन को जगा देती हैं। मानव विज का घाव ठीक नहीं होता है। उसके भीतर का अंतर्द्वंद्व नहीं आता। सौरभ सत्यदेव तो तूफानी ही हैं। बाकी कलाकारों की भूमिका छोटी है।

लेखक और निर्देशक द्वय इस फिल्म के लिए उत्साह के पात्र हैं। छोटी सी कहानी को करीब पौने दो घंटे के स्क्रीन प्ले में गिरने से लेकर उस स्क्रीनप्ले से दर्शकों को बांध के रखना दुरूह कार्य होता है लेकिन उन्होंने ये कर दिखाया है। फिल्म में कई सीन्स ऐसे हैं जहां लेखक की और निर्देशकों की पैनी नजर, छोटी-छोटी बातों पर ध्यान रखने की आदत पर रोक लगाई जा सकती है, बजाय नीना गुप्ता द्वारा कर्पूर गौरम गाने के। वो पूजा के समय पहली पंक्ति ही गाती रहती हैं, आगे की पंक्तियाँ ही नहीं आतीं। फिल्म में गालियां भी हैं। इसलिए परिवार के साथ देखने में असुविधा हो सकती है लेकिन इतनी कड़ी दवाई तो ऐसी ही दी जा सकती है। देखिये, तुरंत।

विस्तृत रेटिंग

कहानी:
स्क्रिनप्ल:
डायरेक्शन:
संगीत:

टैग: नीना गुप्ता, संजय मिश्रा

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Saurabh Namdev

| PR Creative & Writer | Ex. Technical Consultant Govt of CG | Influencer | Web developer
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