
<पी शैली ="टेक्स्ट-एलाइन: जस्टिफ़ाई करें;">उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में ओबीसी लेटर रद्द होने के बाद योगी सरकार हरकत में है। ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले बनाने का नियम लागू करने के लिए सरकार ने रिश्ता संबंध न्याय अवतार सिंह की अध्यक्षता में एक पैनल बनाया है। पैनल अगले 3 महीने में सरकार को पहली रिपोर्ट सौंपेगा।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों ही एक याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया था कि बिना ओबीसी तथ्य के ही निकाय चुनाव आयोग जाएं। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद कई भाजपा पर शक है और वास्तव में रद्द होने का आरोप सरकार पर लग रहा है।
ओबीसी नटखट का नया विवाद क्या है?
निकाय चुनाव में ओबीसी को 27% नटखट देते हुए राज्य सरकार ने एक्सपोजर की सूची जारी कर दी थी। सरकार के इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद की लखनऊ बेंच में याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए कहा कि निकाय चुनाव में ओबीसी वर्ग के आरक्षण सीट को सामान्य माना जाएगा और सही समय पर चुनाव के हिसाब से जारी किया जाएगा।
यूपी सरकार ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। कोर्ट में 4 जनवरी को इस पर अगली सुनवाई हुई है। सर्वोच्च न्यायालय में सरकार ने कहा है कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही यूपी नगर निकायों के चुनाव आयोग में जाएँगे।
ओबीसी घोषणा पर 2 बड़े बयान…
1. अखिलेश यादव, एसपीए प्रमुख- बीबीसी के पिछड़ों के प्रति व्यवहार सौतेला रहा है। अभी तक लेटे-लेटे अधिकार का खुलासा किया जा रहा है, फिर भी पर्लिप्स का खुलासा किया जाएगा। बीजेपी के लोग सिर्फ लेटरे का वोट लेते हैं जानते हैं, उन्हें विज्ञापन नहीं देते हैं।
2. जब भी सामाजिक न्याय और तथ्यों के समर्थन में पक्ष रखने की बात सामने आती है, तो भाजपा का प्रत्यक्ष विरोधी चेहरा सामने आता है। यूपी के नगर निकाय निकाय चुनावों में बीजेपी सरकार की घोषणा रवैए से ओबीसी वर्ग के महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार खत्म होने की कगार पर हैं।
बवाल नया नहीं है… 4 प्वॉइंट्स
यूपी में ओबीसी राजनीति पर विवाद नया नहीं है। इसकी शुरुआत 1960 के दशक में ही शुरू हो गई थी। धीर-धीरे ओबीसी वोट बैंक को देखते हुए कोई भी पार्टी इस पर रिस्क नहीं लेना चाहती है।
1. 1960 के दशक में लोहिया ने नारा दिया पिछड़ा पावे सौ में साठ- राम मनोहर लोहिया सम्मानित के बड़े नेता थे। 1965 में यूपी के फर्रुखाबाद लोकसभा सीट से उपचुनाव कांग्रेस के बाद लोहिया ने कई गठबंधन का गठबंधन तैयार किया। लोहिया उस समय संयुक्त समाजवादी पार्टी (संसोपा) में थे। 1967 के चुनाव में लोहिया ने नारा दिया- संसोपा ने बांधी किंकी, लेटरे पावें सौ में साठ।
2. मंडल आयोग और यूपी की राजनीति में बवाल- 1979 में केंद्र की मोरारजी देसाई की सरकार ने सरकारी नौकरी में लेटरों को स्पष्ट करने के लिए बीपी मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया। आयोग के गठन के बाद ही यूपी-बिहार के अधिकांश भाग में बवाल शुरू हो गया। इस स्टीरियो को तब के विपक्षी जुनिया और इसे वास्तव में विरोधी बवाल कहते हैं।
1989 में राजीव की सरकार जाने के बाद कांग्रेस के बागी वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। पीएम बनने के बावजूद वीपी सिंह की सियासी जमींदोज हो गई थी। उन्होंने इसे मजबूत करने के लिए मंडल आयोग के संयोजनों को लागू करने का ऐलान कर दिया। इसके बाद यूपीआई सहित पूरे देश की राजनीति ही बदल गई।
1989 से लेकर अब तक यानी 33 साल में 26 साल तक यूपी की कमान लाठियों के हाथ में ही रही है।
3. स्थायी-कांशीराम का गठबंधन और बीजेपी हार गया- 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद बीजेपी को यकीन था कि आगामी विधानसभा चुनाव में उनकी जीत तय है, लेकिन 1993 में खेल हो गया। सपा के घेरे सिंह यादव और बसपा के कांशीराम ने गठबंधन किया है।
पिछड़े और दलित नेताओं के इस गठबंधन ने यूपी में बीजेपी को पटखनी दी. 425 शॉक पर हुए इस चुनाव में बीजेपी को 177 एक्सपोजर पर जीत मिली। इस चुनाव में बीजेपी को 44 डिग्री का नुकसान हुआ है. संबद्ध सिंह ने गठबंधन बनाकर सरकार बना ली और खुद बन गए।
4. शपथ ने 17 ओबीसी वर्गों को डायरी में शामिल कर दिया- तीसरी बार यूपी की सत्ता में आने के बाद लिपट सिंह यादव ने ओबीसी राजनीति में धार देने के लिए बड़ी हिस्सेदारी निभाई। 2005 में फर्जीवाड़ा ने ओबीसी के 17 खातों को ब्रोकरेज श्रेणी में शामिल किया। इन जातियों की ओर से लंबे समय से इसकी मांग की जा रही थी।
मुलायम के इस फैसले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तुरंत रोक लगा दी, जिसके बाद उन्होंने केंद्र को प्रस्ताव बनाकर भेज दिया। बाद में मायावती की सरकार ने इसे वापस ले लिया।
2016 में अखिलेश यादव ने फिर से प्रस्ताव पास कर केंद्र के पास नोटिफिकेशन के लिए भेज दिया। इसे सेंटर ने वक्त मान भी लिया, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फिर रोक लगा दी।
ओबीसी सबसे बड़ा वोट बैंक, उनकी रोजाना ट्रेन
उत्तर प्रदेश में ओबीसी मतदाताओं की आबादी 40% से अधिक है। राज्य के करीब 200 विधानसभा क्षेत्रों में ओबीसी फैक्टर काम करता है। 40 से 40 से अधिक भीड़ पर ओबीसी मतदाता प्रभावी हैं।
2022 के चुनाव में ओबीसी समुदाय के 153 विधायक बने हैं। इनमें बीजेपी से 90 और एसपी से 60 विधायक हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में ओबीसी समुदाय में सबसे ज्यादा यादव 9% है।
2014, 2017, 2019 और 2022 के चुनाव में गैर यादव ओबीसी के वोट बीजेपी को मिले हैं। इनमें कुर्मी, मौर्या और निषाद जाति प्रमुख रूप से शामिल हैं।



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