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लकड़बग्घा मूवी रिव्यू इन हिंदी स्टारर अंशुमान झा परेश पाहुजा रिधि डोगरा मिलिंद सोमन, रेटिंग:{2.5/5}

अच्छे-अच्छों को अलग करता है। अपना बना लेता है। फिर चाहे सामने वाला कितना भी पत्थर दिल हो, उसे प्यार मां की तरह बना देता है। इंसान के मामले में ये बात कितने नाम से बैठती है, पता नहीं लेकिन बेजुबानों के मामले में ये चीज खरे सोने के माफ हो गई है और ये ही विक्टर मुखर्जी की फिल्म ‘लकड़बग्घा’ में भी दिखती है। सिनेमा में 13 जनवरी को रिलीज होने वाली इस मल्टी स्टारर फिल्म में अंसुमान झा, रिद्धि डोगरा और परेश पाहूजा का काम कैसे हो रहा है और कैसी है इस फिल्म की कहानी, आइए बताते हैं।

विवरण

दस्तावेजों के बारे में सबसे पहले आपको बताएं। पहली रेयर फिल्मों के बैनर बनी इस फिल्म में अंशुमान झा प्रोड्यूसर भी हैं। उन्होंने अर्जुन बक्शी की पहचान बनाई है। ये एक मार्शल आर्ट्स ट्रेनर और कुरियर बॉय भी हैं। रिद्धि डोगरा अधिकारी अक्षरा डिसूजा का रोल कर रही हैं। वहीं परेश पाहूजा इस फिल्म में रिद्धि के भाई आर्यन डिसूजा का पोस्टर बजाते नजर आ रहे हैं। ये फिल्म में विलेन बने हैं जो स्मगलिंग का काम करता है।

‘लकड़बग्घा’ की कहानी (लकड़बग्घा की कहानी)

पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में इस फिल्म की कहानी चर्चा में है। अर्जुन बक्शी, जिनमें बुजबान पशु से बेहद प्यार होता है। वहीं आर्यन उन बेजुबानों को मारता है और उनके अंदर ड्रग्स भरकर विदेशों में सप्लाई करता है। लकड़बग्घा की शुरुआत अर्जुन बक्शी से होती है। , जो सड़कों के कुत्तों को अपना दोस्त मानते हैं। उन्हें भी आने नहीं देते। अगर किसी भी कुत्ते को नुकसान पहुंचने की कोशिश की जाती है या फिर पहुंचा दी जाती है। उन्हें मारता या परेशान करता है तो अर्जुन एक मसीहा की तरह उनकी हड्डी-पसली तोड़ देते हैं।

शहर के सभी कुत्ते नहीं कर सकते लेकिन अर्जुन बक्शी के आसपास वाले कुत्ते होते हैं। यहां तक ​​कि उनकी दो पेटी वो आर्यन के प्लान पर आ जाती हैं। हालांकि एक बच जाता है और एक की बलि चढ़ाई जाती है। अब सवाल ये है कि मूवी का नाम लकड़बग्घा क्यों पड़ा? वो इसलिए क्योंकि धंधे के दौरान आर्यन को लकड़बग्घा सप्लाई करना होता है। लेकिन रास्ते में ही अर्जुन का आर्यन के आदमियों से पंगा हो जाता है। इस बीच लकड़बग्घा भ्रासा हो जाता है। लेकिन बाद में दिखाया गया है कि वो भागा नहीं, अर्जुन का रिकॉर्ड में होता है और उसकी गुलमा बन जाती है। अर्जुन उसकी अच्छी तरह से देखभाल करता है।

उद्र, कुत्तों को बचाने के दौरान जो आए दिन गुंडो की पिटाई होती रहती है, उनकी जांच अक्षरा कर रही होती है। वह मुजरिम को खोजते हैं कि वास्तव में ये सब कर कौन रहा है। उन पर ऊपर से बहुत दबाव पड़ता है। लेकिन फिल्म में उनकी छानबीन कुछ खास दिखाई नहीं देती। फिल्म के अंत में उन्हें आर्यन के जरिए पता चलता है कि ये सारा काम अर्जुन कर रहा है, जिसे वह प्यार करती हैं। जब गिरफ्तार होते हैं तब अर्जुन उन्हें धोखे से कमरे में बंद करके आर्यन से अपने कुत्तों की मौत का बदला लेता है।

इस दौरान अर्जुन की आर्यन और उसके साथियों में बहुत मारधाड़ होती है, लेकिन अंत में जब आर्यन थक जाता है, तो अर्जुन प्यार से लकड़बग्घा को बुलाता है। आर्यन को ये बात समझ नहीं आती है और जैसे वो बंदूक टंटा है, लकड़बग्घा आर्यन पर ही अटैक करता है और अर्जुन को एक स्क्रोइन तक नहीं आता है। मतलब समझे? वही, जो शुरू में बात कही थी कि प्यार अच्छे-अच्छों को चढ़ा देता है। यहां अर्जुन ने लकड़बग्घा के साथ भी ऐसा ही किया।

‘लकड़बग्घा’ की समीक्षा (लकड़बग्घा समीक्षा)

सबसे कम स्क्रीन स्पेस मिलिंद सोमन को मिला। वो इसमें अर्जुन के पापा बने हैं। वही अर्जुन को मार्शल आर्ट्स में ट्रेन करते हैं क्योंकि बचपन में अर्जुन को स्कूल में बुली किया जाता था और उसे कुछ पता नहीं था। स्कूल से नाम काटकर घर ले आएं और उसे ट्रेनिंग दें। देखा तो इसमें मिलिंद ने कैमियो किया है। फिर आते हैं अर्जुन पर। इन जबरदस्ती एक्शन और मार्शल आर्ट्स का पूरा हुनर ​​दिखाया गया है। इन्हें देखकर दो लोगों की याद आई। एक तो इलेक्ट्रिक जामवाल और दूसरा टाइगर श्रॉफ। वो भी मस्क वाले। क्योंकि इन दोनों की पूरी फिल्म में एक जैसा है। सिर्फ हाथ और पैर ही चल रहे थे। कुत्तों के साथ समय बिता रहे थे। डायलॉग्स इतने नहीं थे इसलिए एक्टिंग के मामले में ये निल बटा सन्नाटा ही रहे।

अब आते हैं परेश पाहूजा पर जो कि विलेन बने हैं। वे भी 2 घंटे में काफी कुछ करने की कोशिश की। पहचान में रोक दिखा रहा है। लास्ट में लिटिल सा एक्शन भी। शातिर को दिखाया गया है लेकिन डायलॉग्स में भी बहुत कुछ शूट किया गया है। गहन विवरण है। देखकर ठीक ठाक फ़ील आया। वहीं, बहन अक्षरा अर रिद्धि को पुलिस बनाया गया। लेकिन वो ताव और जजबा जो एक पुलिस अधिकारी के चरित्र में देखने को मिलता है, वो नहीं दिखाई दिया। सिंपल और सुंदर सी दिखें। लेकिन जिस तरह के पद पर थे, उस होश से ये रोल बहुत-सा था।

‘लकड़बग्घा’ का टेलीकॉम (लकड़बग्घा ट्रेलर)

लेखन और निर्देशन

फिल्म का लेखन आलोक शर्मा ने किया है और इसका निर्देशन विक्टर मुखर्जी ने किया है। अवधारणा अच्छी है। फैमिली पैक फिल्म है। बेजुबान जानवर को किस तरह प्यार और अपनी चाहत होती है। सड़क पर कैसे घूम रहे कुत्तों को किस तरह की सुरक्षा की जरूरत होती है और उन्हें गलत तरह से ट्रीट किया जाता है। उनका जान का कोई प्रपत्र नहीं होता है, वो सब बखूबी दिखाया गया है। लेकिन किरदारों के साथ उस तरह से इंसाफ नहीं किया गया है। हालांकि ये फिल्म अभी आगे भी लगी है यानी इसका दूसरा हिस्सा आया है लेकिन पहले हिस्से में ही मेकर्स ने सुला दिया और लकड़बग्घा नाम रखने के लिए बीच में उस जानवर को घुसेड़ दिया, ये हजम नहीं हुआ। वह चाहता है तो इसके साथ और थोड़ा प्रयोग कर सकता है। पूरी फिल्म के अलावा एक बंगाली गाने का दूसरा हिंदी गाना नहीं है। इमोशनल एंगल देने के लिए कुत्तों की बलि चढ़ाई दिखाई गई लेकिन मिलिंद सोमन कहां गए, कैसे हुई मौत, मां का क्या रोल था? कुछ नहीं पता। फैंटेसी बनाने के चक्कर में हद से ज्यादा फैंटेसी कर दिया। दूसरे हिस्से में पता नहीं क्या ही करने वाले हैं।

‘लकड़बग्घा’ देखें या न देखें?

‘लकड़बग्घा’ वन टाइम वॉच है। अगल अवधारणा है। ज्यादा शो-शा नहीं है। इसलिए देखा जा सकता है। और अगर अधिकारियों से प्रेम है तो तब देख सकते हैं। छोटा ही सही लेकिन एक संदेश देता है। इस बीच पार्टनरशिप भी है। मगर परिवार के साथ दखल ठीक-ठाक फिल्म है।

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Saurabh Namdev

| PR Creative & Writer | Ex. Technical Consultant Govt of CG | Influencer | Web developer
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