
असम में बाल विवाह में कथित संलिप्ता के लिए अभी तक 3,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है और वे अस्थायी जेलों में बंद हैं, जिसके कारण महिलाएं प्रदर्शन कर रही हैं और उनके परिवार के सदस्य एकलौते सदस्यों की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे हैं।
लौंग। असम में बाल विवाह में शामिल होने के आरोप में हाल में 3,000 से अधिक व्यक्तियों की गिरफ्तारी ने नागरिक समाज को दो झटकों में बांट दिया। एक वर्ग का कहना है कि कानून के बल पर इस समस्या को हल नहीं किया जा सकता है जबकि कुछ तर्क यह है कि कम से कम अब कानून पर चर्चा हो रही है और इससे इस कुरीति पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी। असम में बाल विवाह में कथित संलिप्ता के लिए अभी तक 3,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है और वे अस्थायी जेलों में बंद हैं, जिसके कारण महिलाएं प्रदर्शन कर रही हैं और उनके परिवार के सदस्य एकलौते सदस्यों की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे हैं।
मानवाधिकार वकील देबस्मिता घोष ने कहा कि एक बार शादी हो जाने के बाद कानून वैध बना देता है और ऐसी शादी से होने वाले बच्चों को सभी कानूनी अधिकार मिलते हैं। उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”कानूनी राज्य हैं कि बाल विवाह तभी हो सकता है जब वह कानूनी अदालत में याचिका दायर करता है जो शादी के वक्त नाबालिग था और अगर याचिकाकर्ता नाबालिग है तो याचिका उसके अभिभावक के माध्यम से दायर की जा सकती है हो सकता है।” घोष ने कहा कि अगर ऐसा व्यक्ति याचिका दायर करता है जो शादी के वक्त नाबालिग था तो यह उस व्यक्ति के बालिग होने के दो साल के भीतर दाखिल की जानी चाहिए। घोष ने कहा, ”ज्यादातर गिरफ्तार किए गए लोग जुड़वा अब वयस्क हो जाएंगे और अगर उन्होंने अपनी शादी तय करने के लिए कोई याचिका दायर नहीं की तो सरकार को उनकी निजी जिंदगी में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।”
प्रख्यात विद्वान मनोरमा शर्मा ने कहा कि बाल विवाह बंद होना चाहिए लेकिन यह एक सामाजिक बुरायी है, कानून व्यवस्था की कोई समस्या नहीं है। रेसिट प्रोफेसर शर्मा ने कहा, ”महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था और अन्य चीजों पर ध्यान देने से इसे खत्म किया जा सकता है, न कि किसी घटना में किसी घटना को रोक कर कानून लागू किया जा सकता है। इसे भविष्य में सख्ती से लागू किया जा सकता है।” बाल अधिकार कार्यकर्ता एम. दास कुएह ने कहा, ”राज्य सरकार निश्चित तौर पर एक मजबूत संदेश देना चाहती है कि बाल विवाह बंद होना चाहिए लेकिन ऐसी कार्रवाई के बाद होने वाले प्रदर्शन पर ध्यान देना चाहिए।” यूनिवर्सल टीम फॉर सोशल एक्शन एंड हेल्प (उत्साह) के संस्थापक क्वेह ने कहा, ”पुलिस जब किसी बाल विवाह को रोकने की कोशिश करती है तो उसे सीधा विरोध का सामना करना पड़ता है। इस मामले में इतने लोगों को गिरफ्तार किया गया तो विरोध तो होना ही था।
अभियान की बेहतर तरीके से योजना बनाई जा सकती थी।” उन्होंने कहा कि बाल विवाह की समस्या को पूरी तरह से खत्म करने के लिए एक दीर्घकालीन सतत अभियान की आवश्यकता है। सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम (पीसीएमए), 2006 के तहत कुछ अधिकार हैं जिसके तहत एक अदालत द्वारा किसी अपराधी को दो साल की कैद की सजा सुनाई जा सकती है और उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। क्वेह ने कहा, ”कानून के मुताबिक अगर लड़की और लड़का दोनों शादी के वक्त नाबालिग थे लेकिन अब बालिग हैं तो उन्हें सजा नहीं मिलेगी बल्कि उनकी शादी करने वाले वयस्कों के खिलाफ कार्रवाई होगी।”
बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो)कानून के तहत 14 साल से कम उम्र के बच्चों से शादी करने वालों के खिलाफ राज्य कैबिनेट के फैसले के तहत मामला दर्ज किया जाएगा। साथ ही यह 18 साल से कम उम्र के बच्चों और वयस्कों के बीच यौन क्रिया को अपराध की श्रेणी में डालता है। उन्होंने कहा, ”पॉक्सो कानून के तहत किसी वयस्क और नाबालिग के बीच कोई भी यौन कृत्य करता है। कैंसर और धोखे से शादी के मामलों में ही आपराधिक पहलुओं पर ध्यान दिया जाएगा।”
असम बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एएससीपीसीआर) की अध्यक्ष सुनीता चांगकाकोटी ने दावा किया कि राज्य सरकार द्वारा दिए गए सख्त संदेश के बाद अब लोग राज्य कानून पर चर्चा कर रहे हैं कि उनमें से कितने लोगों को पहले जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा, ”लोगों को अब आसानी से है कि एक कानून के तहत बाल विवाह दंडनीय है। हम उन जागरूकता में जागरूकता अभियान शुरू किए हैं, जहां बाल विवाह के अधिक मामले आते हैं और अधिकाराधिकारियों से समाज में संदेश देने के लिए कुछ मामले दर्ज करने का कहा है।
अस्वीकरण:प्रभासाक्षी ने इस खबर को निराशा नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआइ-भाषा की भाषा से प्रकाशित की गई है।



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