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पीएम मोदी पर ब्लॉग और एक कर्मयोगी के रूप में उनके जीवन पर मां हीराबेन का प्रभाव | ब्लॉग: ‘कर्मयोगी’ मोदी ड्यूटी पथ पर

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छवि स्रोत: पीटीआई
मां हीराबेन की अर्थी को कंधा दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता माने जाने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संवेदनशीलता और कर्मयोगी प्रवृत्ति एक बार फिर हैरान कर गए। सुबह 6 बजे के करीब थे। पता चला कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां हीरा बा की 100 साल की उम्र में निधन हो गया। जो लोग पीएम की सोच को ठीक कैसे से नहीं समझेंगे, स्वभाविक और सहज रूप से ऐसा लगेगा कि देश के प्रधानमंत्री की मां हैं तो फिर जबरदस्त अंतिम दर्शन यात्रा निकाली जाएगी, उनकी झलक दी जाएगी और फिर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। राजनीतिज्ञों की अमूमन प्रवृत्ति तो ऐसी ही होती है। सत्ताधीश और प्रभावशाली लोगों के परिवार और संबंधियों के रिश्ते के लिए न जाने क्या-क्या शोभा देते हैं, यहां तो माया दुनिया की सबसे लोकप्रिय पीएम की मां थीं।

पर ये सामान्य बातें पीएम नरेंद्र मोदी के मामले में बिल्कुल फिट नहीं बैठतीं। थोड़ी देर में जानकारी मिली कि पीएम मोदी अपनी मां के अंतिम दर्शन के लिए निकल चुके हैं। प्रधानमंत्री की मां, अटकलों के मुताबिक एक सरकारी अस्पताल में चल रहा था। जी हां, मनपाड़ा के एक सरकारी अस्पताल में। अहमदाबाद पहुंचने के बाद पीएम अपने छोटे भाई के सामान्य से फ्लैट में पहुंचे, मां के दर्शन किए और मां की अंतिम यात्रा के लिए निकल पड़े। पीएम और अन्य भाइयों ने पार्थिव शरीर को कंधा दिया और सरकार शव वाहिनी में मां हीरा बा के पार्थिव शरीर को लेकर श्मशान घाट रवाना हो गए।

पीएम हाथ के जूते और आंसुओं को एकटक अपनी मां को निहारते रहे, जिन्होंने उन्हें नहीं जलाया था बल्कि उच्च मानव और नैतिक मूल्यों से उनके व्यक्तित्व को गढ़ा भी था। निष्फल माँ के चेहरे पर भी ये संतुष्टि भाव दिख रहा था कि जिन संस्कारों और मूल्यों से गढ़कर अपने जिगर के टुकड़ों को देश के लिए खींचा था, वो देश-दुनिया की नजर में वही सौ प्रतिशत निकले हुए थे। मां की संघर्ष गाथा की हर तस्वीर में बचपन से नरेंद्र मोदी के दिलो-दिमाग पर ऐसा असर डाला, जो तारों के लिए जनकल्याणकारी योजनाओं में बदलाव कर रहे हैं।

ये शव यात्रा वैसी ही थी जो किसी भी अत्यंत सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के यहां होती है। राजकीय प्रभाव का दूर तक कोई उपयोग नहीं हुआ। प्रशासन को निर्देश था कि किसी भी प्रकार की असुविधा सामान्य नागरिकों को न हो। पीएम से मिलने के लिए लाइव प्रॉक्सी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सभी बड़े केंद्रीय मंत्रियों ने ईच्छा एक्सेस किया। प्रधानमंत्री ने सभी को यही कहा कि अन्य दिनों की तरह अपने दायित्वों की निर्दयता करें, आने की जरूरत नहीं, संवेदना स्वीकार की। कोई संभावना नहीं हुई, न ही अवसर दिया गया।

सुबह 9:30 बजे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई और सुबह 10:30 बजे तक संपन्न हो गई। वहां से निकलकर पीएम राजभवन पहुंचे, नहाए और बिना कुछ खाए पूर्व निर्धारित सरकारी कार्यक्रम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के मार्फत जुड़े। व्यक्तिगत दर्द पीएम के चेहरे पर साफ दिख रहा था लेकिन पेय के निर्वात को छुपा रहा था। मातृशोक के बावजूद पीएम ने सरकारी कार्यक्रम को पूर्व निर्धारित रखा लेकिन बंगाल की दूसरी तरफ इसलिए मंच पर नहीं गई क्योंकि उनके छत में ‘जय श्री राम’ का नारा चुभ गया। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि कैसे राज्यपाल और केंद्रीय मंत्री ममता से मनुहार करते हैं लेकिन ममता से मास नहीं हुआ।

आमतौर पर सत्ताधीशों के अहंकार ऐसे ही होते हैं जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को न जाने कैसे अछूते रहते हैं। दुनिया के इतिहास को पलटकर खंगालने पर भी ऐसा उदाहरण देखने को नहीं मिलेगा कि किसी प्रधान मंत्री ने मातृशोक के बावजूद अपने कूदते हुए निर्वाह और कर्म में तनिक भी बदलाव नहीं किया। पीएम ने आज भी सहज भाव से मीटिंग की और उस मिशन को जारी किया जो घर-परिवार के खाने के बाद लेट गया था। प्रधानमंत्री के चेहरे का भाव इस संकल्प को स्पष्ट बता रहा था कि मां की अंतिम यात्रा तो पूरी हो जाएगी लेकिन उस मां के दिए गए संस्कार और मूल्यों की यात्रा तो अनवरत जारी रहेगी और राष्ट्र की सेवा वैसे ही दिखती रहेगी।

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Saurabh Namdev

| PR Creative & Writer | Ex. Technical Consultant Govt of CG | Influencer | Web developer
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